रफाल डील की जांच से साबित हो गया कि राहुल गाँधी ने भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए थे हो रहा सच साबित : विकास उपाध्याय  

रायपुर। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय सचिव विकास उपाध्याय ने कहा, फ्रांस के साथ भारत की हुई रफाल डील की आपराधिक जाँच के लिए एक फ्रांसिसी जज को नियुक्त करने से राहुल गांधी द्वारा 2018 में कही गई ‘मोदी ने देश के युवाओं और वायु सेना से 30,000 करोड़ रूपये छीन कर अनिल अंबानी को दे दिए हैं’ वाली बात सच साबित होते नजर आ रही है। उन्होंने कहा कि रफाल सौदे पर हुए आपराधिक भ्रष्टाचार की जवाबदारी सीधा नरेन्द्र मोदी की है, क्योंकि वे प्रधानमंत्री हैं और इस सौदे पर उन्होंने दस्तखत किए हैं। विकास उपाध्याय ने कहा, भारतीय जनता पार्टी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के जागरूक नागरिकों को टीवी पर ‘तू चोर’, ‘तेरा बाप चोर’ वाला ड्रामा देखकर संतोष करने की कोशिश कर रही है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव विकास उपाध्याय ने रफाल डील की फ्रांस के राष्ट्रीय वित्तीय अभियोजक कार्यालय द्वारा हुए भ्रष्टाचार की जाँच करने एक फ्रांसिसी जज को नियुक्त करने के बाद मोदी सरकार पर हमला बोला है और कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 2018 में इस डील को लेकर जो आरोप लगाए थे, वह फ्रांस द्वारा जाँच करने की कदम बढ़ाए जाने के बाद साबित हो गया है कि रफाल डील में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका पाक-साफ नहीं है। उन्होंने ऐसे ही पाँच सवाल पूछकर मोदी सरकार को इस डील में हुए भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया है।
पहला सवाल :- प्रधानमंत्री मोदी 10 अप्रैल 2015 को फ्रांस यात्रा के दौरान 17 समझौतों पर दस्तखत किए, जिसमें एक रफाल विमान की खरीदी का भी था। फ्रांसिसी कंपनी से खरीदे जाने वाले विमानों की संख्या 126 से घटकर अचानक 36 हो गई। सरकार ने अभी तक देश के संसद या मीडिया को नहीं बताया है कि इतना बड़ा बदलाव कब, क्यों और कैसे हुआ?

दूसरा सवाल :- रफाल की संख्या कम होने के बाद यह एक नया सौदा था, जिसकी कीमत, संख्या और शर्तें बदल गयी थीं। सवाल यह है कि अगर यह नया आॅर्डर था तो नियमों के मुताबिक टेन्डर क्यों नहीं जारी किए गए? यह भी सवाल उठता है कि इस फैसले में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर और केबिनेट कमेटी आॅन सिक्यूरिटी की क्या भूमिका थी? और नहीं थी तो क्यों?

तीसरा सवाल :- विमान की कीमत को लेकर सरकार ने संसद में कोई जानकारी नहीं दी। वजह सुरक्षा और गोपनीयता का मामला बताया गया। जबकि गोपनीयता विमान की तकनीकी जानकारी के बारे में होनी चाहिए। परन्तु सौदा होने से पहले रक्षा राज्य मंत्री सुधार ढामरे ने लोकसभा में बताया था कि एक विमान की कीमत 670 करोड़ रूपये है। जबकि एक विमान की कीमत 1600 करोड़ रूपये के करीब है। तो क्या सरकार की जिम्मेदारी देश को यह बताना नहीं है कि खजाने से लगभग 36,000 करोड़ रूपये से ज्यादा क्यों खर्च हो रहे हैं?

चौंथा सवाल :- मेक इन इण्डिया में रक्षा क्षेत्र पर जोर देने की बात कही गई थी और वायुसेना की जरूरतों का आंकलन करने के बाद ही तय किया गया था कि 126 विमानों की जरूरत होगी। क्या भारत की जनता को बताया नहीं जाना चाहिए कि वायुसेना के लड़ाकू विमानों की जरूरत कम कैसे हो गयी? और सरकारी क्षेत्र की कंपनी एचएएल जिसके पास लड़ाकू विमान बनाने का अच्छा-खासा अनुभव है, जहाँ सैंकड़ो जगुआर और सुखोई विमान बनाए गए हैं, को यह मौका क्यों नहीं दिया गया?

पाँचवा सवाल :- जिस दिन नरेन्द्र मोदी ने पेरिस में विमान खरीदी कर समझौते पर हस्ताक्षर किए, 10 अप्रैल 2015 था। 25 मार्च 2015 को रिलायंस ने रक्षा क्षेत्र की एक कंपनी बनाई, जिसे सिर्फ 15 दिन बाद लगभग 30,000 करोड़ का ठेका मिल गया। उस समय फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने कहा था, रिलायंस के नाम की पेशकश भारत की ओर से हुई थी उसके सामने कोई और विकल्प नहीं था। इससे साफ जाहिर है कि अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाकर ऐसे कंपनी को विमान बनाने का काम दे दिया गया जिसे इस क्षेत्र में कोई अनुभव ही नहीं था। तो क्या मोदी सरकार को इसकी वजह देश को बतानी नहीं थी? विकास उपाध्याय ने कहा, इस पूरे सौदे में सवाल प्रधामंत्री मोदी से पूछे जा रहे हैं लेकिन जवाब उनकी टीम के सदस्य दे रहे हैं, कभी भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा या कोई और। आज जब इस पूरे भ्रष्टाचार की जाँच फ्रांस द्वारा किया जा रहा है तो सवालों की शक्ल में या फिर फिकरे कस कर भाजपा के लोग दे रहे हैं।

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