वन मंत्री की पहल ने निर्दोष को न्याय, मध्यप्रदेश पुलिस ने दर्ज किया हत्या का मामला

00 मृतक के परिवार को मिला एक लाख का चेकसरकारी नौकरी की शिफारिश भी
रायपुर/कवर्धा। वन मंत्री मोहम्मद अकबर की सक्रियता और राज्यपाल सुश्री अनुसईया उईके के हस्तक्षेप ने कवर्धा के आदिवासी झामसिंह व उसके परिजनों को इंसाफ दिलाया है। इस आदिवासी की मप्र पुलिस की गोली से माैत के 11 दिन बाद आखिरकर मप्र पुलिस को न केवल हत्या का अपराध दर्ज करना पड़ा है बल्कि पीडि़त परिवार को 1 लाख रुपए व परिवार के एक सदस्य को नाैकरी देने की घोषणा की है।
6 सितंबर को मप्र-छत्तीसगढ़ सीमा से लगे कवर्धा जिले के निवासी झामसिंह की पुलिस गोली लगने से मौत हो गई थी। मप्र पुलिस ने इसे नक्सली मुठभेड़ कहा था लेकिन ग्राम वासियों के अनुसार वे निर्दोष थे व जंगल में मछली पकड़ने गए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने इस विषय में मप्र के मुख्यमंत्री व राज्यपाल को पत्र लिख इस मामले की जांच के लिए आग्रह किया था। मंत्री श्री अकबर ने इस व्यक्ति को इंसाफ दिलाने की पहल करते हुए एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह,गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को पत्र लिखकर जांच की मांग और दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की मांग की थी। यही नहीं एमपी के सीएम को पत्र लिखने के बाद 24 घंटे के भीतर दूसरी बार पत्र लिखकर कार्रवाई के लिए संज्ञान लेने का आग्रह किया था। इसके अगले दिन श्री अकबर ने छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसईया उईके से फोन पर बात कर उन्हें मामले से अवगत करवाते हुए हस्तक्षेप का आग्रह किया था। मंत्री श्री अकबर के आग्रह पर राज्यपाल सुश्री उईके ने एमपी के सीएम को पत्र लिखकर तुरंत कार्यवाही की बात कही थी। इसके अगले दिन यानी बुधवार को एमपी पुलिस ने झामसिंह मामले में एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है। जब ये मामला सामने आय़ा था, तभी से कबीरधाम जिले के आदिवासी समुदाय ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के जनजातीय समूह में एमपी पुलिस के खिलाफ कड़ा आक्रोश व्याप्त था। झाम सिंह के परिवार को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता श्री अकबर ने दिखाई। नतीजतन एक आदिवासी की फर्जी मुठभेड़ के संगीन मामले में एमपी पुलिस को कार्यवाही करनी पड़ी। यह मामला मानवाधिकार हनन के आरोप से भी जुड़ा था, लिहाजा मानवाधिकारवादी संगठनों की नजर भी मामले पर थी। इस मामले का अपेक्षानुसार निपटारा होने से कबीरधाम जिले के आदिवासी समुदाय ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के समूचे आदिवासी समुदाय ने राहत की सांस ली है।

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