क्या मज़दूरों को जानबूझकर परेशान करने के लिए ट्रेनों को गुमराह किया जा रहा है? : प्रकाशपुंज पाण्डेय 

रायपुर| समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने बड़ी ही बेबाक़ी से कहा है कि देश में लॉकडाउन के दौरान जो श्रमिक ट्रेनें अपने निर्धारित स्थान के बजाय दूसरे स्थानों पर चली जा रही हैं वो कोई मानवीय भूल नहीं हो सकती है। आखिर कैसे हजारों मील का सफ़र तय करने वाली ट्रेन मुंबई से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के लिए निकले और उड़ीसा के राउरकेला पहुंच जाएं उत्तर प्रदेश के बलिया के लिए निकले और महाराष्ट्र के नागपुर पहुंच जाए। अगर ट्रेन छपरा के आगे मोतिहारी जाने वाली है तो वह सीधे जाने के बजाय पीछे जाकर मुगलसराय होते हुए मोतिहारी क्यों जाएगी? यह अपने आप में एक बहुत बड़ा सवालिया निशान पैदा करता है। ऐसा मानवीय भूल के कारण कदापि संभव नहीं है।

इससे यह प्रतीत होता है कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है ताकि मज़दूरों को परेशान किया जा सके। क्योंकि सरकार की मंशा थी कि मजदूर जहां है वहीं रहे। लेकिन मजदूर सरकार की बद इंतजामियों के कारण अपने घरों के लिए निकलने को मजबूर हो गए थे, तो सरकार ने यह सोचा कि अगर ऐसा होता है तो कोरोना काल के बाद विपक्ष के साथ-साथ समूचा देश सरकार की नीतियों और सरकार की व्यवस्थाओं पर सवाल जरूर करेगी जिसका जवाब सरकार को देना मुश्किल हो जाएगा। खैर जमीन पर नहीं लेकिन कागज़ों पर और ट्विटर पर तो रेल मंत्री बहुत ही एक्टिव दिखते हैं। लेकिन पुनः वही बात दोहराई जाती है कि कागज़ों पर होने वाली कार्रवाई से जनता को राहत नहीं मिलती है। जनता को तब राहत मिलेगी जब जमीन पर जाकर काम हो। शायद इसी लिए सुप्रीम कोर्ट को भी मजदूरों के मुद्दे पर स्वयं संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नसीहत देनी पड़ी।

 

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