मुख्यमंत्री ने वन विभाग के अधिकारियों से कहा, छत्तीसगढ़ी भाषा सहित स्थानीय बोलियों को जाने और उपयोग में लाएं

रायपुर| मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वन विभाग के वनमंडलाधिकारियों की बैठक में वन विभाग के अधिकारियों और मैदानी अमले से अपेक्षा की कि वे छत्तीसगढ़ी भाषा सहित स्थानीय भाषा और बोलियों से न केवल अवगत रहें बल्कि उसे समझे और बोलचाल के लिए भी उपयोग में भी लाएं।

उल्लेखनीय है कि अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़़ राज्य निर्माण के बाद यह पहला अवसर है, जब प्रदेश के मुखिया द्वारा विशेष रूप से सिर्फ वन विभाग के वन मंडलाधिकारियों की समीक्षा बैठक लेकर कार्यों की समीक्षा की गई। यह भी उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ राज्य का 44.2 प्रतिशत क्षेत्र वनों से अच्छादित है। आदिवासी बहुल राज्य की लगभग 98 प्रतिशत आदिम जातियों की आबादी वनों एवं इसके आसपास निवासरत है। यह भी उल्लेखनीय है कि नये सरकार द्वारा वनवासियों के हित में अनेक ऐतिहासिक निर्णय लिए गए हैं। तेन्दूपत्ता का संग्रहण दर ढाई हजार से बढ़ाकर चार हजार रूपए प्रति मानक बोरा किया गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर क्रय किए जाने वाले वनोपजों की संख्या 7 से बढ़ाकर 15 की गई है। नरवा, गरूवा, घुरवा, बारी योजना के क्रियान्वयन के लिए भी वन विभाग को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। बैठक में नदी तटरोपण और वनोपज आधारित उद्योगों की स्थापना, हरियर छत्तीसगढ़, हरियाली प्रसार योजना, आगामी वर्षा ऋतु में पौधरोपण जैसे कार्यों की समीक्षा भी की गई तथा अग्नि सुरक्षा हेतु सेटेलाइट आधारित मॉनिटरिंग तकनीक, 7887 संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से किए जा रहे ग्राम विकास के कार्यों पर भी विचार-विमर्श किया गया। मुख्यमंत्री द्वारा वन विभाग की विशेष रूप से समीक्षा करना इस बात को इंगित करता है कि छत्तीसगढ़ राज्य की आधी आबादी जो अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वनों पर निर्भर है के विकास के लिए मुख्यमंत्री द्वारा सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।

 

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