जाति के पेंच में फंसी रायपुर लोकसभा सीट की उम्मीदवारी

०० कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के सामने जातिगत वोटरों को साधने की चुनौती

रायपुर। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पांच उम्मीदवारों की घोषणा करके भले ही बढ़त बना ली होलेकिन रायपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवारी का पेच जातिगत समीकरण के बीच फंस गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के सामने जातिगत वोटरों को साधने की चुनौती है।

रायपुर लोकसभा सीट पर सात बार से रमेश बैस सांसद हैं। रायपुर लोकसभा के जातिगत समीकरण को देखे तो सबसे ज्यादा कुर्मी वोटर हैं। धरसींवा,बलौदाबाजाररायपुर ग्रामीण में ओबीसी वोटर प्रभावी हैंजिसमें कुर्मी समाज से सबसे ज्यादा हैं। यही कारण है कि भाजपा हमेश कुर्मी उम्मीदवार पर दांव लगाती रही है। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने कुर्मी उम्मीदवार उतारने की चुनौती है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुर्मी समाज की नेता छाया वर्मा का टिकट घोषित करने के बाद बदलकर सत्यनारायण शर्मा को दिया था। इसके कारण पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। उधरभाजपा में सांसद रमेश बैस के स्थान पर नये नेता की तलाश जोर-शोर से की जा रही है। लेकिन पार्टी के सामने बैस के अलावा विकल्प नजर नहीं आ रहा है। कुर्मी समाज से आने वाले बैस को जातिगत समीकरण का फायदा मिलता रहा है। कांग्रेस का कोई भी दिग्गज नेता नहीं हैजिसे बैस के सामने हार का सामना न करना पड़ा हो। भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो पार्टी बदले राजनीतिक हालात में किसी तरह का रिस्क उठाने को तैयार नहीं है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक की जगह विक्रम उसेंडी को बनाया गया है। धरमलाल भी कुर्मी समाज से आते हैं। ऐसे में पार्टी के सामने संकट यह है कि अगर बैस की टिकट काट दी गईतो प्रदेशभर में कुर्मी समाज की नाराजगी उठानी पड़ सकती है। इसके पीछे तर्क यह भी दिया जा रहा है कि कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री दोनों पद भूपेश बघेल को दिया हैजो कुर्मी समाज से आते हैं। ऐसे में कांग्रेस भी इस फिराक में है कि कुर्मी नेता को मैदान में उतारकर बाजी मारी जाए।

बदले समीकरण में मुकाबले की होगी टक्कर

विधानसभा चुनाव में रायपुर लोकसभा की नौ में से सिर्फ दो विधानसभा सीट पर भाजपा विधायक की जीत हुई है। लंबे समय बाद विधानसभा में बंपर जीत से कांग्रेस की उम्मीद जगी है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय रायपुर लोकसभा की छह विधानसभा सीट पर भाजपा के विधायक थे। इसका पार्टी को लाभ मिला। लेकिन विधायकों के घटने के बाद इस चुनाव में कड़ी टक्कर का मुकाबला होने की उम्मीद की जा रही है।

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