अक्षय चक्र से बाड़ी और गौठान में मिलेगी 12 महिनों सस्ती जैविक सब्जियां ।

●●लघु और सीमांत किसानों की बाड़ियों और खेतों में नरेगा से बनाया जाएगा अक्षय चक्र।

●●कलेक्टर की अध्यक्षता में अक्षय चक्र खेती के लिए ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों की कार्यशाला आयोजित

रायपुर, /छत्तीसगढ़ सरकार की नरवा, गरूवा, घुरूवा और बाड़ी के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में अभिनव पहल करते हुए रायपुर जिले में अक्षय चक्र कृषि के मॉडल को अपनाया जा रहा है। खेती के इस मॉडल से किसान अब अपनी बाड़ियों और खेतों में न केवल 12 महिने भरपूर हरी-भरी सस्ती जैविक सब्जियां प्राप्त कर सकेंगे बल्कि यह हर दिन उनके रोजगार की गारंटी भी सुनिश्चित करेगा। कलेक्टर डॉ. बसवराजु एस. की अध्यक्षता में आज यहां जिला कलेक्टोरेट परिसर स्थित रेडक्रॉस सभाकक्ष में जिले के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों की कार्यशाला आयोजित हुई। जिसमें अक्षय चक्र खेती के संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान करते हुए उन्हंे गांव के जरूरतमंद, लघु और सीमांत किसानों का चयन करने को कहा गया ताकि मनरेगा से कन्वर्जेंस कर उनकी बॉड़ी और खेतों में यह अक्षय चक्र बनवाया जा सके। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. गौरव कुमार सिंह ने आगामी मंगलवार तक ऐसे चयनित किसानों की बाड़ी के नक्शा व खसरा जिला पंचायत में जमा करने को कहा है ताकि अक्षय चक्र का निर्माण प्रारंभ किया जा सके। डॉ. सिंह ने बताया कि गौठान बनाने के लिए जिले में प्रथम चरण में 81 गांवों का चयन किया गया है, इन गौठानों में भी अक्षय चक्र बनाया जाएगा ताकि ग्रामीणों के साथ-साथ स्कूल और आंगनबाड़ी के बच्चों को भी पोष्टिकता से भरपूर जैविक सब्जियां उपलब्ध करायी जा सकें जो इनके कुपोषण को दूर करने में अहम होंगी।

क्या है अक्षय चक्र खेती

 राज्य सरकार की घुरूवा और बाड़ी की अवधारणा को अपने में समाहित अक्षय चक्र कृषि मॉडल में एक ही समय में एक या दो नही बल्कि पूरे 24 अलग-अलग प्रकार की सब्जियां 12 महिने 10 डिसमिल के छोटे से क्षेत्र में उगाई जाती है। इस मॉडल में किसानों की बाड़ी या खेत में जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहां जमीन में 66 बाई 66 फीट (10 डिसमिल) में एक अष्टभुज गोलाकार चक्र बनाकर आठ खानों में बांटा जाता है। इसके इनर चक्र में आठ खण्ड होते है जिसमें पालक, लाल, मैथी, चौलई सहित विविध प्रकार की भाजियां लगायी जा सकती है उसी तरह इसके आउटर लेयर में आठ खण्ड होते है, जिसमें टमाटर, प्याज, बैंगन, भिण्डी, लौकी, करेला, कुमड़ा, मिर्ची आदि सब्जियां लगायी जा सकती है। चक्र के किनारों में पपीता और केला के पौधें लगाकर फल भी प्राप्त किए जा सकते है। चक्र के हर भाग की एक फीट खुदाई कर मिट्टी बाहर निकाली जाती है। इस चक्र को बनाने के किए किसानों को मनरेगा के तहत रोजगार भी मुहैया होता है। गड्डो में मिट्टी के बदले घुरूवा के कचरे का तीन इंच लेयर बिछाया जाता है। इसके उपर दो इंच मिट्टी डाली जाती है। इसे तीन बार करते है। चक्र के बीचोबीज 5बाई5 फीट का गड्डा भी बनाया जाता है। जिसे अक्षय कुण्ड कहा जाता है। जिसमें गौमूत्र, गोबर, माढ़ और पानी के मिश्रण से अक्षय जल तैयार किया जाता है। जिससे अक्षय चक्र में सिंचाई की जाती है। करीब 90 से 100 दिनों में चक्र में फसल तैयार हो जाती है और किसानों को खुद अपनी बाड़ी से ताजी सब्जियां और आय प्राप्त होने लगती है। अक्षय चक्र में भूमि का ट्रीटमेंट तो होता ही है, किसान बिना रासायनिक खाद के उन्नत फसल भी ले पाते है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि चक्र के हर भाग में एक एकड़ जमीन के लिए उत्कृष्ट जैविक खाद भी तैयार हो जाती है जिसे किसान अपने खेतों में धान आदि फसलों के लिए उपयोग कर सकते है। इस चक्र को अपनाने से किसानों की आमदनी तो बेहतर होगी ही साथ ही बिना रासयनिक खाद के इस्तेमाल से जैविक उत्पाद प्राप्त किए जा सकेंगे।
अक्षय चक्र कृषि को अपनाकर प्रगतिशील किसान बने चमराराम और साथियों को कलेक्टर ने किया सम्मानित   बिलासपुर जिले के अकलतरी गांव के किसान  चमराराम धीवर,  रामकुमार धीवर और  सुखदेव धीवर ने अक्षय चक्र खेती को अपनाकर आज न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किए है बल्कि आज वो पूरे प्रदेश के किसानों के लिए एक रोल मॉडल बन गए है। कार्यशाला में कलेक्टर डॉ. बसवराजु एस. ने इन तीनों प्रगतिशील किसानों को साल व श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया। प्रगतिशील किसान  चमराराम धीवर और उनके साथियों ने इस अवसर कृषि विभाग के मैदानी अमला को अक्षय चक्र के निर्माण और उसके फायदे के संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान की।
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