छत्तीसगढ़ में मनाया जाएगा जगन्नाथ रथयात्रा दिवस

संजू चौहान (बिलासपुर) जगन्नाथ रथयात्रा दस दिवसीय महोत्सव होता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। वर्तमान रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन और बुद्ध हैं छत्तीसगढ़ राज्य मे इसे रथजुतिया के रूप मे मनाया जाता है। रथयात्रा को लेकर पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।कहते हैं कि राजा इंद्रद्युम्न जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया।

आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मंदिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए। राजा के परिवारजनों को यह ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिये वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा। अब तक वह जीवित भी होगा या मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली। इसके बाद राजा-रानी ने इन मूर्तियों को स्‍थापित करके पूजा अर्चना शुरु कर दी। तभी से हर वर्ष यह रथयात्रा नगर में निकाली जाती है।

मंदिर से जुड़ी मान्यता जानकर हो जायेगे हैरान

जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है इसी तरह मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है इस चक्र को किसी भी दिशा से खड़े होकर देखने पर ऐसा लगता है कि चक्र का मुंह आपकी तरफ है।

मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते है यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है।

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