एनटीपीसी के कराए विकास कार्य की उखड रही परते, सीसी सड़क हुआ जर्जर 

०० एनटीपीसी के राखड बाँध से ग्रामीणों को मिल रही खतरनाक बीमारी 

०० 17 भू-विस्थापितों को आज तक नही मिली एनटीपीसी में रोजगार 

०० एनटीपीसी सीपत में कई सालो से जमे है अधिकारी, बिना कमीशन नहीं करते किसी का भी काम   

बिलासपुर। एनटीपीसी सीपत के द्वारा बनाया गया क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यो में भ्रष्टाचार की परते अब धीरे-धीरे बाहर आ रही है| एनटीपीसी द्वारा ग्राम पंचायतो में सीसी सड़क का निर्माण कराया गया था जो अधिकारियो के भ्रष्टाचार के चलते जर्जर हो गया है, जाँजी मुख्यमार्ग से देवतला तालाब तक एवं नहर से पंचायत भवन तक का सीसी सड़क जर्जर हो गया है जो की कुल 26.5 और 15 लाख की लागत से बनाया गया था | एनटीपीसी के द्वारा प्रभावित ग्राम पंचायतों में ढकोसला मात्र के लिए विकास कार्य करवाया जा रहा हैं,सच्चाई तो ये हैं कि प्रभावित किसान और ग्राम पंचायतों का नही बल्कि 10 वर्षो से ज्यादा समय से जमे घोटालेबाज अधिकारीयो  का कारनामा हैं जिसका स्पष्ट उदाहरण बीपी साहू हैं जो पिछले 12 साल से एनटीपीसी में जमा हुआ है और कोई भी अधिकारी एनटीपीसी सीपत आता हैं, तो सीपत के प्रभावित किसान और ग्राम पंचायतों का विकास की बात न रखकर उन्ही रसूखदारों को फायदा दिलाता हैं जिसके सांथ इसका कमीशन तय होता हैं|

नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन का सीपत प्लांट अपनी पुरी क्षमता से बिजली उत्पादन कर रहा है, देश के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने सीपत स्थित इस प्लांट की नीव रखी थी तब छ.ग. में अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी तब से लेकर आज तक 17 भू-विस्थापितों को नौकरी नही मिली। बेहतर पुर्नवास और भू-विस्थापितों को प्लांट में नौकरी की मांग को लेकर आज भी आंदोलन कारी प्लांट के मटेरियल गेट पर आंदोलन के लिए एकत्र हुए। 1998 अभिवाजित मध्यप्रदेश के वक्त म.प्र. के मंत्री दिग्विजय सिंह ने बिलासपुर के तत्कालीन कलेक्टर शैलेन्द्र सिंह को सीपत प्लांट के लिए भुमि अधिग्रहण तथा जनसुनवाई के लिए अधिकृत किया प्लांट के विरोध में तब भाजपा, कांग्रेस और पर्यावरण हितैशी नागरिकों ने आंदोलन किया था। कुछ दिनों तक आम सभा, जन सुनवाई, मिटींग के बाद प्रशासन का डंडा चला था। उसके बाद ही 2002 में अटल बिहारी बाजपेय ने पलांट की नीव रखी थी। 2003 के बाद उस समय का विधानसभा क्षेत्र सीपत था, जिसके विधायक बद्रीधर दिवान थे, ने इसी मटेरियल गेट पर स्थानिय बेरोजगारों को लेकर आंदोलन किया था। उग्र आंदोलन को नियंत्रित करने औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों ने विधायक दिवान के नेतृत्व में एकत्र भीड़ पर हवाई फायर कर दिया था। तब प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विधायक दिवान को विधानसभा में उपाध्यक्ष का पद देकर संतुष्ट किया। विधायक दिवान इस विधानसभा में भी उपाध्यक्ष है। भू-विस्थापित 2002 से आज तक ना जाने कितनी बार ठंड, पानी और धूप में आंदोलन के लिए बाध्य है। लगभग जिले के प्रत्येक कलेक्टर के साथ आंदोलन कारियों की त्रिपक्षिय मिटींग हुई है। कलेक्टर पलांट के जीएम आते है, जाते है। पर भू-विस्थापितों को अभी भी साम्मान जनक पूर्नवास का इंतजार है।

एनटीपीसी सीपत में कई सालो से जमे है अधिकारी :- एनटीपीसी सीपत में कई अधिकारी ऐसे भी है जो पिछले कई वर्षो से यही पैर जमाए हुए है, इन अधिकारियो के चलते क्षेत्र के ग्रामीणों, प्रभावितों की मांगे एनटीपीसी के उच्चअधिकारियो तक नहीं पहुच पाती साथ ही ग्रामीणों व प्रभावितों के हक़ में एनटीपीसी के निर्णयों व सुविधाओ की भी जानकारी प्रभावितों को नहीं दी जाती है जिसके चलते ग्रामीणों को उनका लाभ नहीं मिल पाटा है| सूत्रों की माने तो एनटीपीसी में पदस्थ बीपी साहू जो पिछले 12 साल से एनटीपीसी में जमा हुआ है  जिस्नके द्वारा कोई भी अधिकारी एनटीपीसी सीपत आता हैं, तो सीपत के प्रभावित किसान और ग्राम पंचायतों का विकास की बात न रखकर उन्ही रसूखदारों को फायदा दिलाता हैं जिसके सांथ इसका कमीशन तय होता हैं|  

बिगड़ रहा है क्षेत्र का सामाजिक संतुलन:- एनटीपीसी ने सात से आठ गांव की जमीने ली और लगभग 30 किमी के क्षेत्रफल को प्रभावित किया। सबसे बड़ा प्रभाव सामाजिक क्षेत्र पर पड़ा है। संयंत्र आने के बाद बड़ी संख्या में अन्य राज्यों के नागरिकों ने यहां काम करना शुरू किया। जो लोग संयंत्र के अंदर रहते है। उनका बाहरी नागरिकों से कोई विशेष संबंध नही है। क्योंकि वे टाउन के अंदर रहते है। ठेका श्रमिक टाउन के बाहर रहते है और वे ही छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आबो हवा को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे है। यह ऐसा संकट है जिसे कोई समझ ही नही रहा। छत्तीसगढ़ीया सबले बढ़ीया का नारा लगाने वाले नेता इस मोहावरे को केवल अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते है। यह नारा तब फिका पड़ जाता है जब अन्य प्रदेशों के नागरिक सीपत में आकर काम करते है और क्षेत्र के सांस्कृतिक मुल्यों को बिगाड़ते है। बिलासपुर में केन्द्रीय विश्व विद्यालय के साथ ही दो अन्य विश्व विद्यालय है किन्तु आज तक किसी विश्व विद्यालय ने एनटीपीसी क्षेत्र में बदलते हुए सामाजिक ताने-बाने पर कोई शोक नही कराया। इससे भी यही पता चलता है कि विश्व विद्यालय अपने सामाजिक उत्तर दायित्वों के प्रति कितने गंभीर है|

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