अटल बिहारी के वादों पर खरा नही उतरा एनटीपीसी प्रबंधन

०० प्रभावित ग्रामो के निवासियों को रलिया,कौड़ियां डेम के राखड़ से जीना हो रहा दूभर

बिलासपुर। वर्ष 2002 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने बिलासपुर जिला स्थित सीपत क्षेत्र में एनटीपीसी का शिलान्यास किया था। आज वर्ष 2018 में सीपत बिजली कारखाना अपनी पुरी क्षमता से विद्युत उत्पादन करके राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहा है और प्रबंधन ने पुरी बेशरमी से क्षेत्र के उन नागरिको को धोखा दिया जिन्होंने एनटीपीसी के लिए न केवल अपनी उपजाउ जमीन दी बल्कि अपने गांव का पुरा पर्यावरण भी उद्योग को सौंप दिया। आज संयंत्र के जी.जे.एस. असीन कुमार समंता भले ही पत्रकार वार्ता कर बड़े-बड़े दावे करे और सीपत इकाई को पर्यावरण हितैशी बताए पर असलियत में क्षेत्र के 17 भू-विस्थापित आज भी नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे है ।और क्षेत्र का सांख्यकी बुरी तरह बिगाड़ा गया है। जिससे छत्तीसगढ़ के मूल निवासीयों को आज अपनी परम्पराओं संस्कारों को सुरक्षित रखना लगभग असंभव हो गया है।  नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन का सीपत प्लांट अपनी पुरी क्षमता से बिजली उत्पादन कर रहा है। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेय ने सीपत स्थित इस पलांट की नीव रखी थी। तब छ.ग. में अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। तब से लेकर आज तक 17 भू-विस्थापितों को नौकरी नही मिली। बेहतर पुर्नवास और भू-विस्थापितों को पलांट में नौकरी की मांग को लेकर आज भी आंदोलन कारी पलांट के मटेरियल गेट पर आंदोलन के लिए एकत्र हुए। 1998 अभिवाजित मध्यप्रदेश के वक्त म.प्र. के मंत्री दिग्वीजय सिंह ने बिलासपुर के तत्कालीन कलेक्टर शैलेन्द्र सिंह को सीपत पलांट के लिए भुमि अधिग्रहण तथा जन सुनवाई के लिए अधिकृत किया। पलांट के विरोध में तब भाजपा, कांग्रेस और पर्यावरण हितैशी नागरिकों ने आंदोलन किया था। कुछ दिनों तक आम सभा, जन सुनवाई, मिटींग के बाद प्रशासन का डंडा चला था। उसके बाद ही 2002 में अटल बिहारी बाजपेय ने पलांट की नीव रखी थी। 2003 के बाद उस समय का विधानसभा क्षेत्र सीपत था, जिसके विधायक बद्रीधर दिवान थे, ने इसी मटेरियल गेट पर स्थानिय बेरोजगारों को लेकर आंदोलन किया था। उग्र आंदोलन को नियंत्रित करने औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों ने विधायक दिवान के नेतृत्व में एकत्र भीड़ पर हवाई फायर कर दिया था। तब प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विधायक दिवान को विधानसभा में उपाध्यक्ष का पद देकर संतुष्ट किया। विधायक दिवान इस विधानसभा में भी उपाध्यक्ष है। भू-विस्थापित 2002 से आज तक ना जाने कितनी बार ठंड, पानी और धूप में आंदोलन के लिए बाध्य है। लगभग जिले के प्रत्येक कलेक्टर के साथ आंदोलन कारियों की त्रिपक्षिय मिटींग हुई है। कलेक्टर पलांट के जीएम आते है, जाते है। पर भू-विस्थापितों को अभी भी साम्मान जनक पूर्नवास का इंतजार है।

नेताओं ने खूब छला सीपत के भू-विस्थापितों को :- भू-विस्थापितों के बहाने सभी राजनैतिक दल के नेताओं ने अपनी रोटियां खुब सेंकी। इसमें कांग्रेस, भाजपा कोई भी किसी से पीछे नही है। प्लांट के गेट पर धरना प्रदेशन करके उस वक्त के विधायक बद्रीधर दिवान ने स्वयं के लिए अपनी ही सरकार में एक बड़ा पद प्राप्त किया। गेट पर तब गोली चली थी जांच में कौन दोषी पाया गया रिर्पोट आज तक अप्राप्त है। इसी तरह एक से अधिक बार अजीत जोगी ने आंदोलन का नेतृत्व किया पर अपने वायदों को पुरा नही करा पाए।  इसी तरह क्षेत्रिय विधायक दिलीप लहरिया ने कई बार भू-विस्थपितों के लिए कसमें खाई पर हमेशा तोड़ी। राजनैतिक दल के नेता क्षेत्र में काम करने वाले ठेकेदारों से सिर्फ दबाव की नीति बनाकर अपने हित साधते है। यह बात अलग है कि राजनीति का छोटा कार्यकर्ता ठेका श्रमिक से चंदा लेता और बड़ा नेता कंपनी के बड़े अधिकारी से चंदा लेता है। इनकी दलाली से भू-विस्थापितों का भला नही हो सकता।

बिगड़ रहा है क्षेत्र का सामाजिक संतुलन :- एनटीपीसी ने सात से आठ गांव की जमीने ली और लगभग 30 किमी के क्षेत्रफल को प्रभावित किया। सबसे बड़ा प्रभाव सामाजिक क्षेत्र पर पड़ा है। संयंत्र आने के बाद बड़ी संख्या में अन्य राज्यों के नागरिकों ने यहां काम करना शुरू किया। जो लोग संयंत्र के अंदर रहते है। उनका बाहरी नागरिकों से कोई विशेष संबंध नही है। क्योंकि वे टाउन के अंदर रहते है। ठेका श्रमिक टाउन के बाहर रहते है और वे ही छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आबो हवा को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे है। यह ऐसा संकट है जिसे कोई समझ ही नही रहा। छत्तीसगढ़ीया सबले बढ़ीया का नारा लगाने वाले नेता इस मोहावरे को केवल अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते है। यह नारा तब फिका पड़ जाता है जब अन्य प्रदेशों के नागरिक सीपत में आकर काम करते है और क्षेत्र के सांस्कृतिक मुल्यों को बिगाड़ते है। बिलासपुर में केन्द्रीय विश्व विद्यालय के साथ ही दो अन्य विश्व विद्यालय है किन्तु आज तक किसी विश्व विद्यालय ने एनटीपीसी क्षेत्र में बदलते हुए सामाजिक ताने-बाने पर कोई शोक नही कराया। इससे भी यही पता चलता है कि विश्व विद्यालय अपने सामाजिक उत्तर दायित्वों के प्रति कितने गंभीर है|

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