राष्ट्रपति के ‘दत्तक पुत्रों’ का बदहाल जीवन

 

धीरज शिवहरे (कोरिया) भारतीय संविधान के प्रावधान 342 मे जनजातीय परिभाषा व व्यवस्था दी गयी है। छत्तीसगढ़ जनजातीय बहुल राज्य है। यहां 42 जनजातीय समूहों कि उपस्थिति है। इन्ही मे से एक है, ‘पंडो’ जनजाति। यह जनजाति राज्य के आदिवासी समूहों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। जनजातियों के संरक्षण और उनके विकास के लिए सरकारें प्रतिबद्ध हैं। किंतु आदिवासियों के जीवन मे यह प्रतिबद्धता नजर नही आती। इसका एक बड़ा उदाहरण है पंडो जनजाति।

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के बैकुण्ठपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत मुरमा मे डूमरखोली नामक स्थान है, जहाँ पर राष्ट्पति के दत्तक पुत्रों का निवास है। आजादी के 71 वर्षों बाद भी इनकी बदहाल स्थिति की कल्पना किसी ने नही की होगी। यहां के निवासी जो पंडो आदिवासी हैं, आज तक बिजली, सड़क, पानी आदि सभी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। विकास और योजनाओं से महरूम यह गांव सरकारी गैरजिम्मेदारी का बड़ा उदाहरण है।

राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र

पंडो जनजाति से एक खास बात जुड़ी हुई है। सूचनाओं के अनुसार 22 नवम्बर 1952 को अविभाजित जिला सरगुजा में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी का आगमन हुआ था। उनकी स्मृति में वर्तमान सूरजपुर जिले के पांडवनगर में उनकी स्मृति में एक राष्ट्रपति भवन बनाया गया था जो आज भी मौजूद है। डॉ राजेंद्रप्रसाद से एक ग़रीब आदिवासी ने उनसे पूछा था कि “साहब क्या आप रोटी खाये हैं?” उसका कहने का तात्पर्य था कि रोटी कैसे होती है। उसकी बातों को सुनकर राष्ट्रपति जी का मन द्रवित हो गया, उन्होंने कल्पना भी नही की थी कि देश मे कोई ऐसा भी है। उन्होंने उसी समय पंडो जनजाति को गोद ले लिया। तबसे पंडो आदिवासी राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाने लगे।

नाले में कुआँ बनाकर पानी पी रहे

लेकिन 1952 के बाद भी वह जनजातीय आज भी उसी स्थिति में हो यह अविश्वसनीय है। इसे कोरिया जिले के पंडो जनजाती की वर्तमान स्थिति को देखकर ही समझ आ जाता है। इस इलाके में रहने वाले पंडो जनजाति के लोगों को पेयजल हेतु नाले के बीचो बीच कुवां निर्माण कर पानी एकत्रित कर जीवन यापन करना पड रहा है। इसमे उपलब्ध जल पेयजल के उपयुक्त नही है पर इनकी मजबूरी ही है जो नल आदि के अभाव में यह जल पीने को बाध्य हैं। ऐसी स्थिति में बीमार होने पर इनकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

प्रशासन ने कभी नहीं ली सुध

आलम यह है कि इन पंडो जनजाति के लोगों तक शासन की योजनाएं भी मुश्किल से पहुँचती हैं और ये सर्वसुविधा से अछूते हैं। ये अपनी रोजीरोटी के लिये खेती- किसानी व दूसरों के घर में कार्य करने पर निर्भर हैं। स्थानीय प्रशासन, क्षेत्रीय विधायक व किसी मंत्री ने भी कभी इनकी समस्याओं से रूबरू होना उचित नहीं समझा है। आज जब जनजातीय समूहों की घटती संख्या पर विश्व समुदाय चिंतित है, पंडो जनजाति की यह उपेक्षा अत्यंत चिन्तनीय है। समाज और शासन को अतिशीघ्र इनकी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।

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