नौ सीआरपीएफ जवानों के साहस और वीरता को सलाम किया जिन्होंने देश के लिए न्योछावर कर दी अपनी जान : कांग्रेस

०० रणदीप सिंह सुरजेवाला, इन-चार्ज, कम्युनिकेशंस, एआईसीसी द्वारा जारी किया बयान

०० राष्ट्रीय सुरक्षा पर मोदी सरकार की दिशाहीन नीतियों ने आंतरिक सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा पर चिंता पैदा की 

०० छत्तीसगढ़ के सुकमा में सीआरपीएफ पर नक्सल हमले, नक्सलवाद को नियंत्रित करने के मोदी सरकार के खोखले दावों का खुलासा

 

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में माओवादियों द्वारा शक्तिशाली आईईडी विस्फोट में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 212 बटालियन के कम से कम नौ जवान शहीद हुये और दो घायल हुए। यह वामपंथी चरमपंथियों द्वारा हमारे सुरक्षा बलों पर एक और क्रूर हमला है। हम शहीदों के परिवारजनों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं और उन्होंने घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना करते है। पिछले साल भी छत्तीसगढ़ के सुकमा में भीषण हमला हुआ था, जहां 26 सीआरपीएफ के जवान शहीद हुये थे। पिछले 7 सालों में वह हमला सबसे बड़ा था, लेकिन भाजपा सरकार ने उससे भी कोई सबक नहीं सीखा है।

मोदी सरकार के उद्देश्यहीन, अस्थिर और असंगत नीतियों का प्रत्यक्ष परिणाम भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को उत्पन्न खतरे है। श्री मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सत्ता हासिल करने के लिए मुद्दा बनाने में कड़ी मेहनत की थी, लेकिन पिछले 4 सालों में देश ने एक अनिश्चित सुरक्षा स्थिति ही देखी है। सीमा पार से युद्ध विराम का उल्लंघन, सीमा पार से घुसपैठ, हमारे सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर आतंकी हमलें और हमारे राज्यों में नक्सल हमलें कई गुना बढ़े हैं। खोखले दावे, नारेबाजी और नारेबाजी की प्रचार नीतिगत उपायों का विकल्प नहीं हो सकता। बयानबाजी और सुर्खियों का प्रबंधन केवल परिस्थिति को गंभीर बनाती हैं और देशवासियों को खतरे में डालती हैं। विमुद्रीकरण के बाद, श्री मोदी ने आतंकवाद और नक्सलवाद को खत्म करने का दावा बड़े गर्व से किया, लेकिन तथ्य तो एक अलग कहानी बताते है। विमुद्रीकरण के बाद 23 प्रमुख नक्सली हमले हुए है, जिनमें 97 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 121 नागरिक मारे गए। इसी तरह, विमुद्रीकरण के बाद जम्मू और कश्मीर में 53 प्रमुख आतंकवादी घटनाएं हुईं, जिसमें 99 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 64 नागरिक मारे गए। पिछले 3 सालों में नक्सल हमलों की समग्र तस्वीरों में प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा सरकार के बड़े दावों का पर्दाफाश किया गया है। हाल ही में लोकसभा में (अतारांकित प्रश्न संख्या 1819) के उत्तर और दक्षिण एशियाई आतंकवाद पोर्टल में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, नक्सल हमलें लगातार जारी रहे।

वर्ष         हिंसक हमलों की संख्या  शहीद जवानों की संख्या  शहीद नागरिकों की संख्या

2015     1089                              57                                   93

2016     1048                              66                                 123

2017       908                              74                                 109

2018  (15.02.2018 तक)122        14                                   12

जबकि, कांग्रेस-यूपीए सरकार के पिछले 4 सालों में, नक्सली हमलों की वजह से मौते घटकर आधे से भी कम रह गयी थी। पिछले 14 वर्षों और 95 दिनों में, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के नेतृत्व की भाजपा सरकार इस आंतरिक सुरक्षा मोर्चे पर बुरी तरह विफल रही। हर बार जब नक्सल हमला होता है, तो मुख्यमंत्री ने ठोस कार्रवाई का वादा किया, लेकिन इन हमलों को रोकने के लिए कुछ भी ठोस नहीं किया जा सका।

केंद्र और छत्तीसगढ़ की दोनों ही बीजेपी की सरकारें नक्सलवाद से निपटने की नीति बनाने के मामले में पूरी तरह से विफल रही है। नक्सलवाद से लड़ने में छत्तीसगढ़ सरकार की पूरी ढिलाई और असमर्थता उजागर हो गयी थी, जब सुरक्षा विशेषज्ञ के.पी.एस. गिल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि यद्यपि रमन सिंह और भाजपा सरकार ने उन्हें राज्य में नक्सल विरोधी रणनीति का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया था लेकिन उन्हें कुछ भी न करने और भत्तों और अपना वेतन लेने के लिए कहा गया था।

88-नक्सली प्रभावित जिले में कांग्रेस-यूपीए ने एकीकृत कार्य योजना (आईएपी) शुरू की इस योजना के लिए धन तत्काल योजना आयोग द्वारा स्वीकृत किया गया था और केंद्रीय गृह मंत्रालय के माध्यम से जिलों को प्रदान किया गया था। 2013-14 में 13,000 करोड़ रुपये इन जिलों के लिए विशेष रूप से निर्धारित किए गए थे, लेकिन मोदी सरकार ने इस योजना को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। 2017 के सुकमा हमले के बाद, मोदी सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सल सुरक्षा के लिए 1000 करोड़ रुपये पैकेज की घोषणा की, लेकिन उसका कोई ठोस क्रियान्वयन नहीं हो सका है। 2007 में, कांग्रेस सरकार ने भारत के 250 पिछड़े जिलों के लिए पिछड़ा क्षेत्र अनुदान फंड (बीआरजीएफ) नामक एक विशेष फंड तैयार किया था, लेकिन मोदी सरकार ने इसे भी समाप्त कर दिया। कांग्रेस ने भारत की आबादी के पांचवें हिस्से को फायदा पहुंचाने वाला वन अधिकार अधिनियम, 2006 बनाया। अपने आदिवासी विरोधी और जंगल के रहने वालों के विरोधी रवैये के चलते बीजेपी ने वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों और सुरक्षा को कम कर दिया है, साथ ही खान और खनिज अधिनियम में संशोधन के माध्यम से मुआवजे की अनिवार्य वनीकरण निधि नियम को भी संशोधित कर अप्रभावी बना दिया।  भाजपा अध्यक्ष अमितशाह ने पिछले साल नक्सलबाड़ी से भाजपा विस्तार योजना शुरू की थी। भाजपा विस्तार योजना बनाने और उस पर काम करने के बजाय नक्सलवाद से निपटने के लिए प्रधानमंत्री के साथ योजना बनाई गयी होती तो देश के लिये बेहतर होता। क्या छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार की कोई जवाबदेही का तंत्र है, जो 14 साल तक सत्ता में हैं और नक्सलवाद से निपटने में पूरी तरह असफल रहे हैं?

 

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