जनविरोधी रमन सरकार ने अपने अंतिम बजट में सबको किया निराश : कांग्रेस

०० सरकार के बजट पर प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल एवं नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव ने जताई निराशा

रायपुर। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल एवं नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव ने छत्तीसगढ़ सरकार के बजट पर निराशा व्यक्त की है। छत्तीसगढ़ सरकार के बजट पर सबको निराशा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा प्रस्तुत भाजपा सरकार का अंतिम बजट बेहद निराशाजनक है। इस बजट से किसान, नौजवान, महिलायें, शिक्षाकर्मियों मजदूर सबको निराशा हुयी है। किसानों को बोनस और समर्थन मूल्य के अंतर की बकाया राशि देने के लिये कोई प्रावधान नहीं है जिससे किसानों को निराशा हुयी है। छत्तीसगढ़ का सकल बजट घाटा 6000 करोड़ से बढ़कर 9000 करोड़ हो गया जो चिंता का विषय है।

इस बजट में समाज के किसी वर्ग को कोई लाभ या राहत नहीं मिलने वाला। छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों को हमेशा की तरह धोखा दिया है। बोनस तथा समर्थन मूल्य का वादा सिर्फ वादा बन कर रह गया है। 96 तहसील सूखाग्रस्त है। किसानों की ऋण माफी करने की जगह, मजदूरों को राहत पहुंचाने की जगह, मनरेगा का बजट 2196 करोड़ से घटा कर 1421 करोड़ कर दिया जो एक तरह से गरीबों के प्रति अपराध है। गांव की ओर देखने की बात मुख्यमंत्री रमन सिंह ने की है। यह दृष्टि ऐसी पड़ी है कि बजट में गांव-गरीब मजदूर, किसान की उपेक्षा हो गयी है। गांव और मजूदरों के रमन सरकार को उपेक्षापूर्ण रवैया का महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के बजट प्रावधान घटा दिया जाना जीताजागता सबूत है। जिसे पिछले साल 2166 करोड़ से घटाकर 1419 करोड़ कर दिया गया है। जबकि इस साल छत्तीसगढ़ की 96 प्रतिशत भू-भाग अवर्षा और सूखे का शिकार है। किसानों की कर्जमाफी का भी बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। 50 लाख बेरोजगार के लिये कोई योजना नहीं है। स्टार्ट-अप के लिये 5 करोड़ का प्रावधान युवाओं के सपनों का मजाक बनाने के बराबर है। प्रति बेरोजगार 10 रू आता है। यह इस सरकार के लिये अंतिम बजट ही सिद्ध होगा। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई किन्तु गरीबों की संख्या 18 लाख से बढ़कर 59 लाख हो गई इसका मतलब अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब हुये है। आर्थिक सुधार का दावा करने वाली सरकार मनरेगा मजदूरों को मजदूरी दे पाने में तथा शिक्षाकर्मियों को समय पर वेतन देने में और संविलयन का 14 वर्ष पुराना वादा निभाने में असफल रही है। पिछले वर्ष सरकार ने वनवासियों द्वारा उपार्जित वनोपज का समर्थन मूल्य में जो कटौती किया था जिसे इस साल बोनस के रूप में देकर, बच्चे को बहलाने जैसा प्रयास कर रही है।  शिक्षाकर्मियों के संविलियन पर सरकार पूरी तरह मौन रहकर अपनी संवेदनहीनता को उजागर कर रही है। अपने तीसरे कार्यकाल के अंतिम बजट में रमन सिंह ने एक बार फिर से प्रदेश की जनता को निराश किया। राज्य की जनता को अपेक्षा थी शायद चुनावी वर्ष में ही भाजपा सरकार 2013 के अपने चुनावी घोषणा पत्र के वायदों को पूरा कर दे लेकिन धोखाधड़ी की परंपरा जो भाजपा ने अपने तीनों कार्यकाल 2003 फिर 2008 और 2013 में शुरू की वह 2018 में भाजपा सरकार के अंतिम बजट में जारी रही।न युवाओं से किये गये रोजगार के वायदे पूरे किए गए और न किसानों को राहत दी गयी। भाजपा के संकल्प पत्र के वायदों को पूरा करने के अंतिम अवसर पर भी मुख्यमंत्री ने जनता को ठेंगा दिखा दिया।

बजट में धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2100 और बोनस 300 रू. देने के लिये कुछ नहीं किया गया। बजट में किसान कल्याण कोष की स्थापना का कोई प्रावधान नही है। गोचर विकास बोर्ड के वायदे फुर्र हो गए। वायदा था छत्तीसगढ़ को भारत की कृषि राजधानी बनाने का लेकिन हकीकत में किसान आत्महत्या करने को मजबूर है। कृषि मूल्य आयोग भी बनाने की बात भाजपा के 2013 के संकल्प पत्र में थी कुछ नही किया।  ऑटो चालकों को निःशुल्क बीमा का वायदा भाजपा ने किया था, भूल गए। विकलांग लोगो के लिए अलग पाठ्यक्रम का वायदा किया उसको भी बजट में भूल गए। हालात ऐसे है कि विकलांग मुख्यमंत्री निवास में आत्मदाह करने को मजबूर है। शिक्षित बेरोजगार महिलाओ को 3 प्रतिशत व्याज पर ऋण के वायदे किये थे, बजट में भूल गए।  आईटी हब के सपने 2013 संकल्प पत्र में दिखाये थे, अंतिम बजट तक में भूल गए। सामान्य वर्ग के युवाओं को उच्च स्तर की कोचिंग के लिए यूथ हॉस्टल के वायदे किये थे, बजट में एक रु. का प्रावधान नही है। पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम के लिए भी बजट में कोई प्रावधान नहीं है। 2013 में भाजपा ने 85 आदिवासी विकासखण्ड में सेंट्रल स्कूल के वायदे किये थे, सरकार अपने अंतिम बजट में भी एक भी स्कूल खोलने का प्रावधान नही कर पाई।

शिक्षाकर्मियों का संविलियन फिर पिछले कार्यकाल की तरह छलावा ही साबित हुआ।  भाजपा ने राज्य की 1333 प्राथमिक सहकारी समितियों के युक्ति युक्त करने के वायदे किये थे, बजट में कुछ नही किया। राज्य सहकारिता आयोग के लिए भी बजट मौन है, छत्तीसगढ़ फ़िल्मविकास निगम, छत्तीसगगढ़ लोककला अकादमी के लिए बजट में कुछ भी नहीं। व्यापार उद्योग बोर्ड बनाने की बात भी 2013 के संकल्प पत्र में भाजपा ने किया था अपनी अंतिम सरकार के अंतिम बजट में भी मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कुछ नहीं किया।छत्तीसगढ़ सरकार 25 प्रतिशत वेट और 4 प्रतिशत सेस वसूल रही है। इसे कम किया जाना था ताकि लोगों को कुछ राहत मिल सकें। मुख्यमंत्री पेट्रोल-डीजल पर वसूल रही बेतहाशा करों में कोई कटौती नहीं किया। पेट्रोल-डीजल में 25 प्रतिशत वेट तथा सेस लगाकर छत्तीसगढ़ की जनता को लूटने में लगी है। ये सरकार इस दिशा में कोई कदम न उठाना चिन्ता का विषय है।  सर्वाधिक हठधर्मिता इस सरकार ने शराब बंदी पर दिखायी है। 75 प्रतिशत दुर्घटना, 80 प्रतिशत मान भंग, 50 प्रतिशत बलवा, 56 प्रतिशत परिवार विघटन के लिये जिम्मेदार शराब पर यू-टर्न लेते हुये सरकार ने शराबबंदी का इरादा ही त्याग दिया है। अगर छत्तीसगढ़ की चिंता होती तो सरकार इस विषय में अवश्य ध्यान देती। छत्तीसगढ़ की मातायें, बहनें वादे के अनुसार रमन सरकार से शराबबंदी की उम्मीद रखती थी। इस सरकार ने उन्हें बहुत निराश किया है। शराबखोरी घर परिवार और समाज के लिये घातक सिद्ध हो रही है। किन्तु सरकार का प्राथमिकता राजस्व वसूली मात्र है। समाज की चिन्ता इसे नहीं है। रमन सरकार के अंतिम बजट निराशाजनक निरूपित करते हुये कांग्रेस ने कहा इस बजट से किसान, नौजवान, महिलायें, शिक्षाकर्मियों, मजदूर सबको निराशा हुयी है। बोनस की बकाया राशि देने के लिये कोई प्रावधान नहीं है जिससे किसानों को निराशा हुयी है।  रमन सिंह बजट को कहते है विकास की यात्रा लेकिन बजट विनाश की यात्रा है। शराब से होने वाली घोषित-अघोषित आय का मोह रमन सिंह नहीं छोड़ पाये और भाजपा सरकार शराब बंदी के वायदे से भी मुकर गयी। नौजवानो के लिये रोजगार सृजन की कोई योजना नहीं है। स्टार्टअप के लिये मात्र 5 करोड़ का प्रावधान रमन सरकार की नीयत स्पष्ट है। शिक्षकों की कमी है इसे दूर करने का कोई प्रावधान नहीं। सरकार ने कॉलेज खोलने की घोषणा मात्र कर अपना पल्ला झाड़ लिया। कालेजों की इमारते बनाने की कोई घोषणा नहीं है, शिक्षक भर्ती का प्रावधान तक नहीं है, जबकि वर्तमान महाविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी।

किसानों की आय लागत का डेढ़ गुना करने और स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू करने की बात सिर्फ जुमला साबित हुयी। समर्थन मूल्य 2100 रू. और बोनस 300 रू. के हिसाब से सरकार किसानों का दर से 55500/ प्रति एकड़ की कर्जदार है। क्योंकि प्रति एकड़ सरकार द्वारा किसानों से खरीदी जाने वाली धान की मात्रा 15 क्विंटल के हिसाब से भुगतान में सालाना 12000 रू. का अंतर है। सरकार ने सिर्फ एक साल 4500/बोनस दिया है बाकी राशि बकाया है। बजट में इस दिशा में कोई प्रावधान नहीं होना किसानों के साथ अन्याय है। पेट्रोल-डीजल को वेट नहीं घटाया गया, जिससे आम उपभोक्ता को निराशा हुयी है। शिक्षाकर्मियों के लिये कुछ नहीं। किसानों के लिये न कर्ज माफी, न बिजली बिल माफी का प्रावधान। नये कालेज, शिक्षकों, प्राध्यापको की भर्ती की कोई चर्चा नहीं। पिछले वर्ष टमाटर और सब्जी फेके गये इसके संबंध में बजट में कोई प्रावधान नहीं है। कोल्डस्टोरेज और प्रसंस्करण के लिये कोई प्रावधान नहीं है। गौ-रक्षा पर कोई ध्यान नहीं। नौजवानो के लिये रोजगार बढ़ाने पर बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया।राज्य सरकार प्रति व्यक्ति आय बढ़ने का जश्न मना रही है। जबकि यह आंकड़ा सर्वाधिक चिंताजनक है। प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 92000 हो गया जबकि 58 लाख गरीबी रेखा के नीचे बने हुये है। जिसका अर्थ है गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर हुये है। क्योंकि प्रति व्यक्ति आय का मतलब सभी लोगों का आय का औसत है। कुल मिलाकर इस बजट से महिला, किसान, मजदूर, आदिवासी, अनुसूचित जाति, युवा बेरोजगार के जीवन का अंधकार दूर होने की संभावना नहीं है।

 

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