आदिवासी समाज ने की भूमि क्रय नीति निरस्त करने और बैकलॉग पद्धति से नियुक्ति की मांग 

रायपुर। छत्तीसगढ़ी सर्व आदिवासी समाज ने छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से प्रस्तावित आपसी सहमति से भूमि क्रय नियम 2016 को विधानसभा पटल में रखकर निरस्त करने की मांग की है। संरक्षक सोहन पोटाई और अरविंद नेताम ने आशंका जाहिर किया है कि, आदिवासी समाज का इस नियम से नुकसान होने वाला है। एक जवाब में उन्होंने कहा कैबिनेट में इस नियम को निरस्त किया, लेकिन भविष्य में इस सरकार के बनने पर फिर से यह नियम लागू कर सकती है। इसलिए विधानसभा में पुन: चर्चा आवश्यक है।
पत्रकारवार्ता में आदिवासी समाज के नेताओ ने कहा कि, वर्ष 2003 में शासन के नियमों के अनुसार जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए जो नीति लागू की गई। मात्रात्मक ऋृटि के कारण 22 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति से पृथक किया गया। जिसे 19 दिसम्बर 2017 को पुन: अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया। इस 14 वर्षों में इन वर्गों को मिलने वाला लाभ प्राप्त नहीं हुआ। अत: आदिवासी समाज की मांग है कि, ऐसे प्रत्याशी जो विभिन्न सेवाओं के लिए चयनित तो हुए, लेकिन अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र के अभाव में शासकीय सेवा से वंचित रहे। ऐसे प्रत्याशियों की बैकलॉग पद्धति से नियुक्ति की जाए। एक प्रश्र के उत्तर में अध्यक्ष बीपी एस नेताम ने कहा कि, वंचित वर्गों को समुचित न्याय नहीं मिलने पर हम न्यायालय की शरण में जाएंगे । एनएस मण्डावी ने प्रेस विज्ञप्ति में मंगिया, कोड़ाकू, मुण्डा, कोरवा, पहाडी और कोड़ा जनजातियों की मात्रात्मक त्रुटि सुधार कर अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल करने की मांग की है। सर्व आदिवासी समाज इन मांगों को लेकर 19 फरवरी को राजधानी रायपुर में प्रदर्शन करेंगी।

 

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