मुख्यमंत्री पब्लिक मॉडल स्कूल के शिक्षकों में नैतिक शिक्षा की कमी

०० 2017-18 से डीएवी प्राइवेट स्कूल द्वारा संचालित किया जा रहा है।

०० केजी-वन से लेकर 12वीं तक का प्रवेश शुल्क 8 हज़ार रुपए, सालाना फीस 32 हजार रुपए से लेकर 33 हजार रुपए तक

०० मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल को हिंदी की जानकारी कम बाकी टीचरों में छत्तीसगढ़ी राजभाषा सहित नैतिक शिक्षा की कमी

संजय बंजारे
करगी रोड कोटा| कोटा विकासखंड का मात्र् एक ही डीएवी मुख्ययमंत्री स्कूल गोबरीपाट में संचालित है जिसे प्रदेश के मुखिया  मुख्यमंत्री के नाम से जाने जाते है जो की  निजीकरण कर प्राइवेट स्कूल को दे दिया गया जहां पर यह  स्कूल मॉडल गवर्नमेंट स्कूल के नाम से पहले जाना जाता था अब वही स्कूल डीएवी मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल  से  जाना जाता है इसी की जांच करने दिल्ली से चार सदस्य की टीम  आई थी वहां के पढ़ने वाले बच्चों को सही तरीके से पढ़ाई हो रहा है कि नहीं इसकी  जांच करने के लिए टीम दिल्ली से आया हुआ था मगर वहां के शिक्षकों द्वारा सही रिपोर्ट नहीं दी यह स्कूल CBSE अंग्रेजी पैटर्न के होने के बावजूद भी वहां के बच्चों  को  सही शिक्षा  नहीं दिया जा रहा है वहां के बच्चे सही तरीके से हिंदी भी नहीं बोल पाते तो इंग्लिश कहां से बोल पाएंगे वहां के शिक्षक को सामान्य ज्ञान वह शिक्षा के बारे में कोई भी प्रकार की जानकारी नहीं होती इसकी शिकायत  कई बार अभिभावक लोग भी कर चुके हैं वहां के प्रिंसिपल को लेकिन उनके द्वारा आज तक शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया, बाकी प्राइवेट स्कूलों की तरह चल रहा है,जहां पर 492 बच्चे को शिक्षा मिल रही है आज पूरे प्रदेश में सरकारी स्कूलों की जगह प्राइवेट स्कूलों की दुकानदारी ही चल रही है प्रदेश में शिक्षा के नाम से प्राइवेट स्कूलों द्वारा व्यवसाय किया जा रहा है कोटा ब्लॉक के ग्राम पंचायत गोबरीपाट में प्रदेश के मुखिया के नाम का पहला मॉडल स्कूल चिन्हित किया गया था आदिवासी इलाका होने के कारण आसपास ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीण अंचल के छात्र-छात्राओं को इसका लाभ मिलता, ग्रामीण अंचल के बच्चे भी इस मॉडल स्कूल में पढ़ाई करके अपने आगे का भविष्य उज्जवल बनाते जैसा कि पिछले साल 2016-17 मॉडल स्कूल का परीक्षा परिणाम कोई खास नहीं था जिसकी वजह से मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल के साथ काफी सारी टीचरों ने भी मॉडल स्कूल को अलविदा कह दिया।
नए सत्र 2017-18में यह मॉडल स्कूल का निजीकरण कर दिया वर्तमान में इसे डीएवी द्वारा संचालित किया जा रहा है जैसा की वर्तमान मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल के द्वारा बताया गया  सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार 2 दिन पहले दिल्ली से आई डीएवी स्कूल के संचालकों की कोई टीम आई हुई थी मीडिया को जानकारी मिली पर जब तक मीडिया की टीम पहुंचती दिल्ली से आए हुए लोग जा चुके थे मॉडल स्कूल के प्रबंधन द्वारा यह जानकारी नहीं बताई गई थी,या बताना ही नहीं चाहती थी मीडिया के साथी पत्रकार द्वारा जानकारी चाहने पर मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल जो कि भारत देश की मातृभाषा कहे जाने वाली हिंदी का ज्ञान कम होने के कारण मॉडल स्कूल के ही टीचर को बुलाकर साथी पत्रकार को जानकारी दिया जा रहा था पत्रकार साथी द्वारा जानकारी मांगने पर प्रिंसिपल के दुभाषिये का काम कर रहे टीचर वीरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा पत्रकार को जानकारी उपलब्ध कराने की बजाए उनसे ही उनके पत्रकारिता के बारे में सवाल किया गया बाद में मीडिया के सभी पत्रकार साथियों के पहुंचने पर मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल से इस बारे में जानकारी ली गई उस दौरान दुभाषीये का काम कर रहे टीचर वीरेंद्र प्रताप सिंह मीडिया के सवालों से बचने लगे इधर उधर भागने लगे मॉडल स्कूल को पढ़ाने वाले टीचर वीरेंद्र प्रताप सिंह से पत्रकारों द्वारा पूछा गया कि छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा घोषित किया गया क्या है  आपको इसकी जानकारी है आपको छत्तीसगढ़ी भाषा का थोड़ा बहुत ज्ञान है पत्रकारों द्वारा यह भी पूछा गया की छत्तीसगढ़ का राज्यपाल का नाम क्या है यह सब पूछना था की टीचर वीरेंद्र  प्रताप सिंह जो कि मॉडल स्कूल के छात्र-छात्राओं को केजी वन से लेकर बारहवीं तक के बच्चों को पढ़ाते हैं वह अगल बगल झांकने लगे उनको यह तक जानकारी नहीं थी की छत्तीसगढ़ के राज्यपाल का नाम क्या है आखिरी में उनके साथी टीचर ने नाम बताया वह भी नाम सुनकर साथी पत्रकारों का समूह अचंभित हो गया मॉडल स्कूल में पहली बार पता चला कि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल का नाम प्रेम प्रकाश पांडे है।मॉडल स्कूल में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं को प्रदेश के मुख्यमंत्री का नाम नहीं मालूम नहीं शिक्षामंत्री का नाम मालूम नही जिस मॉडल स्कूल को प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम से गोद लिया गया था आज वहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के साथ वहां पढ़ा रहे शिक्षकों को भी नैतिक शिक्षा की आवश्यकता है,शिक्षा के अधिकार के तहत जिन बच्चों का मॉडल स्कूल में प्रवेश दिया गया था उनको शासन द्वारा निर्धारित राशि जो अनुदान के रूप में संस्था को मिलती है उसके अलावा वहां पर पढ़ने वाले आसपास के छात्र-छात्राएं की फीस के बारे में जब मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल से पूछा गया क्योंकि प्रिंसिपल साहब बाहर से हैं इसलिए अधिकतर जानकारी उनके टीचर द्वारा दिया जा रहा था, स्कूल की फीस के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि कोटा ब्लॉक में जितने भी प्राइवेट स्कूल चल रहे हैं उतनी फीस तो उनकी भी नहीं होगी जितना की मॉडल स्कूल में मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल के साथ ही टीचरों द्वारा बताया गया,की स्कूल के प्रवेश शुल्क के रूप में 8000=00 लिया जाता है साथ ही डेवलपमेंट, ट्यूशन,फीस ट्रांसपोर्ट, इन सभी को मिलाकर लगभग सालाना 32000=00 से लेकर 35000=00 तक प्रति छात्र को मॉडल स्कूल में पढ़ाई के दौरान लिया जाता है,मोटी फीस लेने वाले मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल को मातृभाषा हिंदी बोलने में  परेशानी आती है, जिसके लिए आगे की जानकारी देने के लिए उन्हें अपने ही  टीचर को द्विभाषीय के रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है।
छत्तीसगढ़ी  राजभाषा घोषित होने के बाद भी प्रिंसिपल सहित बाकी टीचरों को भी छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान कम होना मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल सहित बाकी शिक्षकों मैं नैतिक शिक्षा की कमी को दर्शाता है।
नैतिक शिक्षा की आवश्यकता मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल सहित टीचरों को भी देने की आवश्यकता है स्कूलों की फीस तो काफी मोटी ली जाती है पर बच्चों को अगर खेलकूद करना हो तो मॉडल स्कूल का अपना खुद का खेल का मैदान नहीं है मॉडल स्कूल के बच्चों को सामने सरकारी स्कूल  बच्चों का प्रदेश के खेल मैदान में ही खेलना पड़ता है।राज्यपाल मुख्यमंत्री शिक्षा मंत्री सहित बाकी सारे मंत्रियों विधायकों के नाम वहां पढ़ने वाले छात्र छात्राओं को जानकारी नहीं है,आज प्रदेश के सरकारी स्कूलों का स्तर कितना गिरता जा रहा है उसके साथ ही आए दिन पढ़ाने वाले शिक्षकों के हड़ताल,पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों हलाकान हैं क्योंकि कोटा विकासखंड आदिवासी बाहुल्य इलाका है कहते हैं गांव में प्रतिभा बहुत होती है बस उसे ढूंढने की आवश्यकता होती है आज ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से छात्र छात्राएं जो की शिक्षा के अभाव में आगे बढ़ नहीं पाते हैं सरकारी स्कूलों का स्तर इतना गिरा दिया गया है यह समझ में नहीं आता कि सरकार की नियत क्या है क्या सरकार यही चाहती है कि ग्रामीण इलाकों के छात्र-छात्राओं को अच्छी शिक्षा ना मिले क्या बस उन्हें पहली से लेकर आठवीं तक यूं ही पास करते रहेगी दोपहर का खाना खिलाकर उसे मजदूर ही बना कर रखना चाहती है या फिर ज्यादा से ज्यादा कोटवार या फिर शिक्षाकर्मी या फिर पटवारी क्या ग्रामीण अंचल के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके ग्रामीण प्रतिभा भी आगे चलकर आईएएस-आईपीएस बने इसकी जवाबदारी शासन प्रशासन की नहीं है, या फिर सरकार यह सरकार की नीति के नीयत पर ही यह सवाल उठता है कि शासन व प्रशासन के मातहत अधिकारी भी नहीं चाहते की ग्रामीण अंचल की प्रतिभाएं आगे चलकर देश का नाम प्रदेश का नाम ब्लॉक का नाम रोशन करें जिस प्रकार से सरकारी स्कूलों का स्तर दिन-ब-दिन गिरता जा रहा है और प्राइवेट स्कूलों का स्तर बढ़ता जा रहा है उससे तो आने वाले सालों में यही लगता है कि आने वाले सालों में अगर आप अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं आईएएस-आईपीएस बनाना चाहते हैं तो आपको सरकारी स्कूल नहीं प्राइवेट स्कूलों की तरफ ताकना पड़ेगा वरना आपके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने तो जाएंगे पर ना उन्हें अच्छी शिक्षा मिलेगी ना ही वह आगे बढ़ पाएंगे बस दोपहर का खाना आपको सरकार खिलाएगी उसके आगे आपको ज्यादा जानकारी की आवश्यकता नहीं पिछले दिनों संविलियन को लेकर शिक्षा कर्मियों का 12 से 15 दिनों तक जो हड़ताल चला उससे भी कहीं ना कहीं यह संदेश जाता है कि सरकार की मंशा भी आने वाले समय को देखते हुए शिक्षाकर्मी भी कम करने की योजना को दर्शाती है जब सरकारी स्कूल ही नहीं होंगे तो शिक्षाकर्मियों का क्या काम।

 

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