माहो कीट के प्रकोप को प्रारंभिक स्तर पर ही नियंत्रित करना जरूरी

०० कृषि वैज्ञानिकों ने दी धान फसल की सतत् निगरानी करने की सलाह

रायपुर| कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने धान की फसल में कहीं-कहीं पर माहो कीट के प्रकोप की जानकारी मिलने पर किसानों को फसलों की सतत् निगरानी करने का सुझाव दिया है। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा आज यहां जारी कृषि बुलेटिन में बताया गया है कि धान फसल में माहो कीड़ों की संख्या 10 से 15 प्रति पौधा हो जाने पर शुरूआत में ब्युपरोफेजिन 800 मिली लीटर की मात्रा एक हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए।

कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि इसके बाद भी प्रभावित धान फसल में माहो-कीट का प्रकोप बढ़ता दिखाई दे तो डाइनेतोफ्यूरान 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पानी में घोल बनाकर दोपहर को धान पौधों के आधे भाग पर छिड़कना चाहिए। जीवाणुजनित झुलसा रोग दिखने पर यदि संभव हो तो खेतों का पानी निकालकर 10 किलो पोटाश प्रति एकड़ के मान से भुरकाव करना चाहिए। ऐसी स्थिति में खेतों को तीन दिनों तक सूखा रखने के बाद पानी भरना चाहिए। धान के खेतों में पानी की सतह के ऊपर पौधों के तनों पर यदि मटमैले रंग के बड़े-बड़े धब्बे दिखाई दे रहे हों तथा यह धब्बे बैगनी रंग के किनारों से घिरे हो उसे शीथब्लाइट रोग कहते हैं। इस बीमारी के नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाजोल फफूंदनाशक दवा की एक मिलीलीटर मात्रा एक लीटर पानी में मिलाकर पौधों के रोगग्रस्त हिस्से पर छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर 12-15 दिन बाद फिर से इस दवा का छिड़काव किया जा सकता है।कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में काफी बड़े रकबे में धान फसल के बाद खेतों में तिवड़ा की उतेरा खेती होती है। किसान तिवड़ा की उन्नत प्रजातियों जैसे प्रतीक, रतन, महातिवड़ा आदि की बोनी कर अधिक उपज ले सकते हैं। बरसाती मूंग और उड़द की पक चुकी फल्लियों की तोड़ाई किसानों को करनी चाहिए। कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि बुलेटिन में बताया है कि समय पर फसलों की बोआई हो जाने से इन फसलों को विभिन्न बीमारियों से बचाया जा सकता है। समय पर बो ली गई फसलों में अच्छी उपज भी मिलती है।

 

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