जतमई माता के चरणों को छुकर झरने का रूप लेती है नदी

०० बारिश के मौसम में यहाँ का दृश्य होता है रोमांचक व मनोहारी

०० राजधानी से सबसे करीब पर्यटन स्थल है जतमई-घटारानी देवी स्थल

रायपुर। ऐसे तो छत्तीसगढ़ में सैकड़ो पर्यटन स्थल है जो अपने आप में बेहद खूबसूरत व रोमांचक है मगर राजधानी से सबसे करीब घने जंगलो से घिरे पहाड़ो से निकलने वाली प्राकृतिक नदी का मनोहारी दृश्य साथ ही जतमई माता मंदिर से होकर नदी की जलधाराए आगे जाकर झरने का रूप लेने की वजह बेहद रमणीय व रोमांचक प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है| बारिश का मौसम आते ही प्रकृति प्रेमियों के लिए यह स्थल बेहद ख़ास हो जाता है साथ ही देवी स्थल के रूप में विख्यात धार्मिक स्थल इस का मज़ा दुगुना कर देता है|हजारों साल पहले कमार आदिवासियों द्वारा बनाए गए इस मंदिर की कहानी लोगों को इस झरने में गोते लगाने को मजबूर करती है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 70 किमी दूर राजिम मार्ग पर घने जंगल व पहाडियों के शीर्ष में जतमई माता का मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि हजारों साल पहले यहां रहने वाले आदिवासियों की ये देवी थीं।किंवदंतियों के अनुसार यहां सर्पाकार नाम का एक राक्षस रहता था ये आए दिन जंगल में रहने वाले भील और कमार आदिवासियों के बच्चों और मवेशियों को खा जाता था। यूं कहें तो विशालकाय सांप रहता था जिसे लोग दैत्य मानने लगे थे। स्थानीय लोगों में इतना डर हो गया कि आखिरकार इसके निदान पर विचार होने लगा।तब एक बुजुर्ग ने माता की स्थापना करने की सलाह दी। बस इस मंदिर के बनते ही वो दैत्य कहां चला गया किसी को पता नहीं है। लोग मानने लगे कि मां ने उसका वध कर दिया। बारिश के मौसम में यहां आने वाले लोग यहां की खूबसूरती और रोमांच में खो जाने को मजबूर हो जाते हैं।माता के मंदिर के ठीक सटी हुई नदी की जलधाराएं उनके चरणों को छूकर चट्टानों से नीचे झरने के रूप में गिरती हैं जिसके कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालु व सैलानी इस झरने में नहाने का मज़ा लेने से नहीं चूकते हैं।कहते हैं ये जलधाराएं माता की सेविकाएं हैं यहां आने वाला हर शख्स यही कहता है कि जन्नत में आ गया।

मां के आशीर्वाद से मिलता है संतान सुख:-  ऐसी मान्यता के है कि जतमई माता के मंदिर में वे लोग भी आते हैं जो नि:संतान हैं। यहां ऐसे दंपति आते हैं और मिन्नत का धागा पेड़ों में बांधते हैं। ऐसा कई बार देखा गया कि है कि मां के आशीर्वाद से लोगों के घरों में खुशियां आई हैं।यहां के चट्टान एक दूसरे पर ऐसे जमें हैं जैसे लगता है कि किसी कारीगर ने उन्हें काट-छांटकर बाकायदा जमा दिया हो।मंदिर के पास में करीब 150 फीट से ज्यादा लंबी हनुमान जी मूर्ति इस प्राकृतिक सुषमा में चार चांद लगा देती है। जतमई की ये पहाड़ी 200 मीटर क्षेत्र में फैली है। इसकी ऊंचाई 70 मीटर है। बरसात के मौसम में यहां पिकनिक जैसा माहौल रहता है।

 

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