हाई व हायर सेकेंडरी स्कूल प्रभारियों की मनमानी से बच्चों की पढाई चौपट

०० शासकीय काम के बहाने कई प्रभारी स्कूल छोड़कर सिमगा में घूमकर अपना निजी काम निपटाते

 सिमगा। ब्लॉक के ज्यादातर हाई व हायर सेकेंडरी स्कूल प्रभारियों के भरोसे है। प्रभारियों की मनमानी बच्चों के भविष्य पर भारी पड़ रही है।अधिकांश स्कूलों में इन कथित प्रभारी प्राचार्यों के विषय की पढाई पूरी तरह ठप्प है। शासकीय काम के बहाने कई प्रभारी स्कूल छोड़कर सिमगा में घूमकर अपना निजी काम निपटाते हुए नज़र आते है। उच्चाधिकारियों की निरंकुशता और कथित राजनितिक संरक्षण से इनके हौसले बुलन्द है। बच्चों का भी अब इन विषयों की पढाई न होने से सरकारी स्कूल के प्रति मोहभंग होने लगा है।जल्द ही यदि प्रभारियों पर नकेल नही कसी गयी तो कई पालक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर अन्यत्र निजी स्कूलों में भेज सकते है।

सूत्रों की माने तो  बनसांकरा, नवागांव दोनों हायर सेकेंडरी स्कूलों में नियमित प्राचार्य हैं,पर ये दोनों ही स्कूल नही आते । बनसांकरा के प्राचार्य साल भर से मेडिकल पर है वहीं नवागांव के प्राचार्य  किसी परियोजना के नाम पर जिला मुख्यालय में सेवा दे रहे है। इसके चलते इनके स्थान पर व्याख्याता पंचायत प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्यरत है। ऐसे ही दर्जनों स्कूलों में जहाँ नियमित प्राचार्य नही है वहां प्रभारियों के भरोसे पूरी शिक्षा व्यवस्था  का जिम्मा है। पर जब जिम्मेदार लोग ही मनमानी करने लगे तब व्यवस्था का चौपट होना लाज़मी है। सिमगा के आस पास के स्कूलों के प्रभारी कतिपय बहाना बनाकर आये दिन स्कूल में उपस्थिति पंजी में हस्ताक्षर डालकर गायब रहते है। कभी बैंक,कभी कम्प्यूटर,कभी बीईओ,कभी डीईओ तो कभी मण्डल कार्यालय तक जाने के बहाने से ये बंक मारते हैं। इसके बाद ये सिमगा आकर अपना निजी काम निपटाते है और घर में मज़े से आराम करते है। जबकि इनके विषय की पढाई के लिए बच्चे स्कूलों में इंतज़ार करते रहते है। सबसे ज्यादा नुकसान तो भौतिक,गणित,रसायन, विज्ञानं जैसे विषयों के गायब रहने वाले प्रभारियों से बच्चों को होता है। नये कलेक्टर राजेश सिंह राणा के दौरों से जरूर कुछ समय के लिये स्कूलों की व्यवस्था चुस्त दुरुस्त हुई थी,पर अब फिर उसी पुराने ढर्रे पर है। स्कूलों में किसी स्टॉफ को तक पता नही रहता की किस काम से उनके प्रभारी आज कहाँ है। दूसरे दिन जब आकर वो रजिस्टर में कुछ लिखे तब पता चलता है कि वो कथित रूप से मण्डल कार्यालय गया था। जबकि उसी दिन वह अपने बच्चे को हॉस्पिटल में भी दिखा आता है। ऐसे ही रजिस्टर में डीईओ बैठक लिखकर कोई अपना आरटीओ दफ्तर में निजी काम निपटाता है तो कोई रोजगार कार्यालय का। अर्थात एक ही तारीख में एक ही समय व्यक्ति कई जगहों पर एक साथ उपस्थित रहता है। ज्यादातर प्रभारी शाला विकास समिति का भी अप्रत्यक्ष रूप से दुरूपयोग करते है। स्कूलों में बच्चे सीधे सिंटेक्स की गंदी टँकियों से सप्लाई होने वाले पानी को पी रहे है। जबकि स्कूल स्टाफ स्टील बर्तन में रखे साफ़ पानी का सेवन करता है। कई स्कूल में तो शाला विकास समिति के पैसे से कूलर खरीदे गए है,जबकि बच्चों के लिए खेलने की कोई सामग्री दिखती नही।  स्कूल में साफ़ सफाई का आभाव भी देखा जाता है। कार्यालयीन स्टाफ बड़े बाबू,क्लर्क का तो भगवान ही मालिक है। कब आते है कब जाते है आते है भी या नही कोई देखने वाला नहीं। प्रभारी अपने ज्यादा जरूरी बाहरी कामों को कार्यालयीन स्टाफ से करा सकता है। इससे अध्यापन कार्य जरा भी प्रभावित नही होगा। बहरहाल अधिकांश प्रभारी वाले स्कूलों में उन विषयों की पढाई चौपट है जिन विषयों के प्रभारी है।

भौतिक की पढाई सालों नही हुई,बच्चे कला वाणिज्य लेने लगे :बनसांकरा हायर सेकेंडरी में सालों से भौतिक के पीरियड के लिए बच्चे तरस गये थे। जबकि इसी विषय के व्याख्याता की यहाँ सबसे पहले नियुक्ति हुई है। नये कलेक्टर के आने के बाद खौफ में सही इस वर्ष बच्चों को कुछ दिनों तक एक दो पीरियड भौतिक पढ़ने का अवसर मिला,पर अब फिर से अनियमित है। कुछ बच्चों ने सिर्फ भौतिकी की पढ़ाई न होने की वजह से दूसरे स्कूल का रुख कर लिया या फिर कला,वाणिज्य जैसे विषयों में प्रवेश ले लिया है।

 

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