जल जंगल जमीन ही आदिवासियों की जीविका, उन्हे रखा जा रहा वंचित : चौधरी

०० नक्सली और पुलिस के मध्य बंधे हुए हैं आदिवासी

०० आदिवासियों को उनकी जमीन से किया जा रहा विस्थापित, मानवाधिकारों का हो रहा उल्लंघन

रायपुर। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर प्रदेश सहित राजधानी रायपुर मे विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन मे शामिल होने इस बार संयुक्त राष्ट्र संघ के परमानेंट फोरम ऑफ इंडीजिनस इशु के (यूएनपीएफआइआई) उपाध्यक्ष फूलमान चौधरी सोमवार से छत्तीसगढ़ प्रवास पर है। नक्सली कौन हैं ये बात संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई निवास समिति के उपाध्यक्ष फूलमान चौधरी नहीं जानते, लेकिन वादा जरूर किया कि, वे यूनाइटेड नेशन तक आदिवासियों की समस्या को जरूर पहुंचाएंगे। ये ´बातें मंगलवार को उन्होंने न्यू सर्किट हाउस में एक पत्रकारवार्ता में कही। उन्होंने आगे कहा कि संविधान में वर्णित मूल अधिकारों का क्रियान्वयन भी बस्तर के आदिवासी इलाकों में कायदे से नहीं हो पा रहा है। राजधानी में उन्होंने राज्यपाल बलरामदास टंडन से भी मुलाकात की। इससे पूर्व बस्तर के दौरे पर रहे। अपने तीन दिवसीय दौरे पर वे छत्तीसगढ़ का अध्ययन कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि, आदिवासियों को यह तक पता नहीं था कि, यूनाइटेड नेशन क्या है। सन 1994 से शुरू हुए विश्व आदिवासी दिवस के बाद जागरूकता आई है। भारत के संविधान में वर्णित आदिवासियों के अधिकार और यूनाइटेड नेशन से जारी नियम आदिवासियों तक कायदे से पहुंचना चाहिए। उन्होंने बताया कि, राज्यपाल बलरामदास टंडन से भी आदिवासियों के गंभीर मामलों पर चर्चा हुई। राज्यपाल ने छत्तीसगढ़ के मसलों को भारत सरकार तक प्रमुखता से पहुंचाने की बात कही है। राज्यपाल टंडन से चौधरी ने कहा कि, आदिवासी क्षेत्रों में संविधान का उल्लंघन हो रहा। अधिकार नहीं मिल रहे। यूनाइटेड नेशन का समझौता भारत सरकार से हुआ लेकिन इंप्लीमेंट नहीं हो रहा। छत्तीसगढ़, झारखंड सहित अन्य आदिवासी बाहुल्य राज्यों में मानवाधिकार की समस्या है। कैसे समाधान होना चाहिए, इस पर चर्चा हुई।
प्रमाण है रिपोर्ट तैयार करूंगा : चौधरी ने कहा कि, आदिवासियों पर हो रही लगातार प्रताडऩा और घटना का प्रमाण भी उनके पास है। जल्द ही वे इस गंभीर विषय पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेंगे। यूनाइटेड नेशन तक बात पहुंचाएंगे।एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि, दिल्ली तक आदिवासियों की बात नहीं पहुंच रही, यह तो उन्हें नहींं मालूम। यदि ऐसा है तो आदिवासियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून भी बने है, जो राज्यों में भी फॉलो होना चाहिए। इस विषय पर भी वे जरूर सोचेंगे। नक्सली कौन है इस विषय पर उनकी स्टडी नहीं है। इस पर वे कुछ टिप्पणी नहीं किए। हां इतना जरूर कह गए कि, भारत सरकार आदिवासियों के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए वफादार हो। छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ी समस्या जमीन की है। आदिवासियों को उनकी जमीन से विस्थापित किया जा रहा है। मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। आदिवासी दो पाटो में पिस रहे हैं। बहरहाल नक्सली और पुलिस के मध्य आदिवासी बंधे हुए हैं। एक की बात न माने तो दूसरा नाराज और माने तो नक्सली के सहयोगी बता दिया जाता है । ऐसे में सवाल तो यही उठता है कि आखिर आदिवासी कहाँ जाएँ ?

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