नौ साल की उम्र में पहली बार मिला मंच : ममता चंद्राकर

रायपुर। छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध लोक गायिका पद्मश्री ममता चन्द्राकर रविवार को रुबरु कार्यक्रम में शामिल हुईं। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन की कई अहम बातों को साझा किया। ममता ने बताया कि, जब वे नौं साल की थीं, तब पहली बार उन्हें गायन का मंच मिला उस वक्त वे हिन्दी फिल्मों के गाने गाया करतीं थी।
पद्मश्री ममता चन्द्राकर ने कहा कि, उस वक्त अविभाजित मध्यप्रदेश में दो संस्थाएं हुआ करती थीं, जो छत्तीसगढ़ी गायन पर जोर देती थीं, उनमें है चंदैनी गोंदा और सोनहा बिहान। उस वक्त ममता को दोनों संस्थाओं ने अपने कार्यक्रम में गाना गाने से इंकार कर दिया था, फिर ममता के पिता स्व. महानसिंह चन्द्राकर ने ठानी कि, ममता को छत्तीसगढ़ की शीर्ष लोक गायिका बनाना है। तब से उनका सफर शुरु हुआ और उसके बाद से ममता ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा और लगातार एक के बाद एक छत्तीसगढ़ी गाने गाती चली गई । ममता को वर्ष 2016 में सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा।
ममता ने बताया कि, उनकी सबसे पहली सुरपहिट गीत तोर मन कईसे लागे राजा… ने उन्हें नाम दिलाया। फिर उन्होंने छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला स्थित ओटेबन में अरपा पैरी के धार… गाया था। ओटेबन में इस गाने को अच्छा प्रतिसाद मिला फिर इस गीत को लोगों ने अपने ज़ुबां में बसा लिया। इस गीत को 1976 में ममता ने गाया था। गौरतलब है कि, कुछ दिन पहले इस गीत को राज्यगीत का गौरव दिलाने प्रदेश के सामाजिक संगठन सामने आए थे , सरकार ने भी इस पर विचार शुरु कर दिया था, लेकिन इस गीत को देश के ख्याति प्राप्त गायकों से गवाने के कारण इसका विरोध हो गया था। इस मामले में प्रेम चन्द्राकर ने कहा कि, इस गीत को राज्यगीत का गौरव दिलाने प्रदेश सरकार को विचार करना चाहिए और इस गीत को किसी दूसरे गायक ने नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोक कलाकार पद्मश्री ममता चन्द्राकर से ही गवाया जाना चाहिए।

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